काबुल। अफगानिस्तान पर कब्जा करने वाले तालिबान ने सभी के लिए माफी का वादा किया था, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत है। खासकर महिलाओं के लिए। महिलाएं काम से दूर हो गई हैं, घरों में कैद हैं, विरोध करने पर उन्हें प्रताडि़त किया जा रहा है। तालिबान के इस रवैये की गवाही देती तस्वीरें और वीडियो दुनियाभर में वायरल हो रहे हैं।
काबुल विश्वविद्यालय की एक छात्रा को डर है कि उसने जो भी कुछ भी सपने देखे, सब ‘खतरे’ में हैं। हजारा समुदाय की सदस्य यह लड़की कहती है, मेरी गरिमा, मेरा अभिमान, यहां तक कि एक लड़की के रूप में मेरा अस्तित्व, मेरा जीवन सब खतरे में हैं। कौन जानता है कि घर-घर जाकर लड़कियों को उठा ले जाएंगेे। मैंने सोच लिया है कि वे हमारे घर आते हैं तो मैं खुद को मार डालूंगी। मेरी सहेलियां भी यही सोच कर बैठी हैं। वे उठाकर ले जाएं और बलात्कार करें, इससे बेहतर मौत है। इस लड़की ने न केवल अपनी डिग्रियां जला दी हैं, बल्कि सोशल मीडिया खातों को भी निष्क्रिय कर दिया। वह कहती है कि 13-14 साल की लड़कियों को भी बुर्का पहनाया जा रहा है।
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गर्भवती थी, तब झेला सितम-
तालिबानियों के जुल्मो-सितम को याद करके हथिरा हाशमी सिहर उठती हैं। क्रूर तालिबानियों ने उनकी दोनों आंखें निकाल ली और खूब यातनाएं दीं। वह दिल्ली के लाजपत नगर में रहती हैं। करीब नौ माह पहले अफगानिस्तान से दिल्ली आईं हाशमी बताती हैं कि उन पर ऐसे अत्याचार इसलिए हुए, क्योंकि वह अफगान पुलिस में काम करती थीं और महिलाओं के हित में आवाज बुलंद करती थीं। हाशमी दो माह की गर्भवती थीं, तब उन पर तालिबानी आतंकियों ने हमला किया था। वह भारत आईं और यहां बेटे को जन्म दिया। उनके पांच बच्चे अभी भी अफगानिस्तान में हैं। वह अपने परिवार को लेकर चिंतित हैं।
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पहले से ज्यादा बर्बरता-
फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में अफगानिस्तान की एक महिला ने कहा कि तालिबान नहीं बदला है और इस समय कोई भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है। वे पहले से ज्यादा मजबूत और बर्बर हो गए हैं। मैंने अपने पति के साथ एयरपोर्ट जाने की कोशिश की, लेकिन तालिबान ने हमें रोका। हमें पीटा गया। मेरे पति को भी बंदूक की बट से मारा गया था।
बिना पुरुष के बाहर नहीं –
एक अन्य महिला कहती हैं, तालिबानी कह रहे हैं कि लड़कियां स्कूल जा सकती हैं। लेकिन अब वे अकेले बाहर नहीं जा सकती हैं। उन्हें पुरुष संरक्षक की जरूरत है। वे कहती हैं, एक दिन हमारी शिक्षिका स्कूल जाने के लिए रिक्शा में बैठीं। तालिबान ने उन्हें रोका और बिना पुरुष रिश्तेदार के शिक्षिका को ले जाने के लिए रिक्शेवाले की पिटाई की।
न्यूज एंकर को महिला होने के कारण निकाला-
रेडियो टेलीविजन अफगानिस्तान(आरटीए) के लिए छह साल से काबुल में कार्यरत न्यूज एंकर शबनम ने पश्तो भाषा में सोशल मीडिया पर वीडियो के जरिए अपना दर्द बयां किया है। शबनम ने कहा, जब वह दफ्तर पहुंचीं तो तालिबान लड़ाकों ने उन्हें यह कहते हुए घर जाने को कहा कि वह महिला हैं। आरटीए में महिलाओं को काम करने की आजादी नहीं है।
सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हस्तियां मिटा रहीं ‘पहचान’ –
सोशल मीडिया पर सपनों की लंबी उड़ान भर रहे अफगानी युवाओं के लिए तालिबानी शासन किसी पिंजरे में कैद किए जाने जैसा है। सोशल मीडिया के आकाश की लंबी और उन्मुक्त उड़ान के उनके पंख अब कट गए हैं। सोशल मीडिया के सहारे अपनी पहचान बनाने वाले युवा अब तालिबानियों के कहर से बचने के लिए उसे मिटाने में जुटे हैं। उन्हें डर है कि कहीं उनके वीडियो यदि तालिबानियों के हाथ लग गए तो उनकी जान की खैर मनाना मुश्किल होगा।
तालिबानियों के सत्ता में आने से पहले सिंगिंग रियलिटी शो की कंटेस्टेंट व गायिका सिद्दीकी मददगार के यूट्यूब पर 21,200 सब्सक्राइबर थे। इंस्टाग्राम पर उसके 1.82 लाख फॉलोअर थे। सिद्दीकी ने वीडियोज के जरिए अफगान संस्कृति और संगीत को पूरे विश्व में पहुंचाया है। वे कहती हैं कि अब इस हालत में अपने दुख का इजहार करना मुश्किल है। अपनी सरजमीं को इस तरह बर्बाद होते देख कर दिल टुकड़े-टुकड़े हो जाता है।
आयदा नहीं जानती कि उसका क्या होगा-
आयदा शहदाब भी फैशन की दुनिया में चर्चित रही हैं। उनके इंस्टाग्राम पर 2.90 लाख और टिकटॉक पर 4 लाख चाहने वाले थे। लेकिन अब आयदा को नहीं पता कि तालिबानी फैशन के क्षेत्र को किस तरह लेंगे।
अल्पसंख्यकों के नरसंहार पर उतरा तालिबान-
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे से अल्पसंख्यकों के लिए आने वाला वक्त बेहद मुश्किलों से भरा है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि गजनी प्रांत में मालिस्तान के मुंदरख्त गांव में 4 से 6 जुलाई के बीच हजारा समुदाय के 9 पुरुषों की हत्या की गई। 6 को सीधे सिर में गोली मारी गई जबकि 3 को तड़पा-तड़पा कर मौत दी गई। एमनेस्टी ने इन हत्याओं के चश्मदीदों से बात करने व तस्वीरें देखने का दावा किया है। संयुक्त राष्ट्र से हजारा समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहा है। ग्रामीणों ने एमनेस्टी को बताया कि सरकारी बलों व तालिबान के बीच भीषण लड़ाई के बीच वे पहाड़ों पर भाग गए थे। खाने-पीने का सामान लेने घरों की ओर लौटे तो तालिबानी पहले से ही इंतजार कर रहे थे। उनके घर भी लूट लिए गए।